खैरागढ़। खैरागढ़ शहर में यातायात का दबाव कम करने के लिए जिस बाईपास सड़क को एक साल में बनकर तैयार होना था, वह अब 15 साल पूरे कर चुकी है, लेकिन सड़क आज भी “निर्माणाधीन स्मारक” बनी हुई है। शायद यह बाईपास नहीं, बल्कि धैर्य परीक्षा योजना थी, जिसमें जनता लगातार पास होती जा रही है और सिस्टम बार-बार फेल।
इस सड़क के निर्माण में अब तक कई ठेकेदार आए और गए, कुछ टर्मिनेट हुए, कुछ नए टेंडर लेकर आए, लेकिन सड़क वहीं की वहीं खड़ी है। लगता है ठेकेदार बदले, सरकारें बदलीं, अफसर बदले, पर बाईपास का भाग्य नहीं बदला। भाजपा शासन में शुरू हुई सड़क कांग्रेस शासन में भी अधूरी रही और अब फिर भाजपा की सरकार आ गई, लेकिन बाईपास अब भी अधूरा इतिहास लिख रही है।
स्थिति यह है कि एक तरफ पुल बन रहा है, तो दूसरी तरफ पहले से बनी सड़क खुद ही उखड़ने लगी है। मानो सड़क भी कह रही हो—“जब पुल ही पूरा नहीं होगा, तो मैं क्यों टिकी रहूं?” सड़क निर्माण के दौरान जमीन मुआवजे में करोड़ों रुपये खर्च किए गए, यानी जनता का टैक्स जमीन में गया, लेकिन सड़क शायद कमीशन के आसमान में उड़ गई।
खास चिंता का विषय यह है कि आमनेर नदी पर बन रहा सेतु अभी भी अधूरा है, और जो बन रहा है, उसकी गुणवत्ता देखकर लोग भविष्य की कल्पना कर डर रहे हैं। जिस रफ्तार और अंदाज़ से निर्माण हो रहा है, उसे देखकर लगता है कि पुल का उद्घाटन होने से पहले ही मरम्मत की नौबत आ सकती है।
और मज़ेदार बात यह है कि यह बाईपास सड़क पूरी तरह सर्पाकार बनाई गई है, जहां दुर्घटना की संभावना हमेशा मौजूद रहती है। केसीजी जिला बने तीन साल हो गए, लेकिन किसी प्रशासनिक अधिकारी ने न तो इस सड़क का ढंग से निरीक्षण किया और न ही ठेकेदार को सख्त हिदायत दी।
छत्तीसगढ़ के इतिहास में शायद यह पहली सड़क होगी, जिसे बनने में 15 साल से ज्यादा लग गए, और अब भी यह सवाल बना हुआ है—
बाईपास पहले पूरा होगा या जनता का इंतज़ार?
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