खैरागढ़। लगातार बढ़ती महंगाई ने आम आदमी के साथ-साथ अब किसानों की भी कमर तोड़ दी है। एक ओर जहां चांदी के बढ़ते दामों ने सराफा बाजार की रौनक फीकी कर दी है, वहीं दूसरी ओर किसानों के लिए खेती की सबसे जरूरी खाद—यूरिया—अब “चांदी से भी महंगी” साबित हो रही है।
बीते दीपावली पर्व के दौरान जहां चांदी का भाव लगभग 1 लाख 50 हजार रुपये प्रति किलो था, वहीं दीपावली के बाद इसमें जबरदस्त उछाल देखने को मिला और दाम बढ़कर करीब 3 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए। बढ़ती कीमतों के चलते सोना-चांदी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है और सराफा बाजार में मंदी का माहौल बना हुआ है।
कुछ ऐसी ही हालत किसानों की भी है। खरीफ सीजन के दौरान यूरिया की बढ़ी हुई कीमतों ने किसानों को भारी परेशानी में डाल दिया था। सरकार द्वारा यूरिया का अधिकतम खुदरा मूल्य 266.50 रुपये प्रति बोरी (सभी कर सहित) निर्धारित किया गया है, लेकिन निजी दुकानों में यही यूरिया दो से तीन गुना अधिक कीमत पर बेचा गया। इससे किसानों की उत्पादन लागत तो बढ़ी ही, ऊपर से मोंधा तूफान ने फसलों को नुकसान पहुंचाकर रही-सही कसर भी पूरी कर दी। अधिक लागत लगाने के बावजूद किसानों को अपेक्षित उपज नहीं मिल सकी।
खरीफ सीजन में पूरे छत्तीसगढ़ में यूरिया की कालाबाजारी को लेकर कार्रवाई भी की गई। खैरागढ़ में एक किसान की शिकायत पर कृषि विभाग ने कार्रवाई करते हुए एक निजी दुकानदार के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया और 700 रुपये प्रति बोरी की दर से बेचे जा रहे यूरिया को जब्त किया था।
अब रबी सीजन की शुरुआत के साथ ही, जब किसानों को यूरिया की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब एक बार फिर कालाबाजारी सिर उठाती नजर आ रही है। के.सी.जी. जिले के मुख्यालय में यूरिया 480 रुपये प्रति बोरी तक बिक रहा है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी कीमत 550 रुपये प्रति बोरी तक वसूली जा रही है। इतना ही नहीं, किसानों को जबरन लादान भी दिया जा रहा है, जिसमें नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, सल्फर, झाइम आदि शामिल हैं। इन उत्पादों की अलग-अलग कीमत किसानों से जबरन वसूली जा रही है।
स्पष्ट है कि यूरिया के नाम पर एक बार फिर किसानों को ठगा जा रहा है। समय पर खाद डालने की मजबूरी में किसान ऊंची कीमत चुकाने को विवश हैं। सवाल यह है कि इस गंभीर और संवेदनशील मामले पर कृषि विभाग कब तक ठोस और प्रभावी कार्रवाई करेगा, या फिर किसान यूं ही महंगाई और कालाबाजारी की मार झेलता रहेगा।




